Tuesday, July 15, 2008
मेरे पिताजी
जब मैं बच्चा था तो अक्सर सोचता था कि हम लोग अपने पिताजी को पिताजी क्यों कहते हैं जबकि बाकि बच्चे अपने पिता को पापा कहते हैं, तो हमारी माँ समझाती थी कि हम लोग स्पेशल हैं इसलिए ।
पिताजी मेरे माथे पर तिलक लगाते तो मुझे उतना आनंद नहीं आता था, जितना अब जब वो साल में या कभी कभी और भी ज्यादा अंतराल में लगाते हैं तो आता है । अब मैं स्वयं रोज तिलक करता हूँ और सोचता हूँ कि हाँ मैं स्पेशल हूँ । और यह मेरी पहचान है ।
आज मैं आप सबको मेरे स्कूल के पहले दिन का किस्सा सुनाता हूँ । मैंने अपनी पढ़ाई तीसरी कक्षा से शुरू की थी दो साल मैं स्कूल नहीं गया। कारण मुझे भी नहीं पता लेकिन हाँ मैं लिखना और पढ़ना पहले ही सीख लिया था। कैसे, ये भी नहीं मालूम मुझे याद है मैं स्कूल जाने से पहले ही कॉमिक्स पढ़ लेता था । और मेरी पसंदीदा जगह थी हमारे घर के आँगन में लगा अमरुद का बड़ा सा पेड़ जिसकी डालपर घंटों बैठा मैं अमर चित्र कथा की कॉमिक्स पढता रहता था ।
खैर एक टेस्ट लेने के बाद स्कूल प्रबंधन ने मुझे तीसरी कक्षा में प्रवेश दे दिया।
पहले दिन जब मैं स्कूल गया तो सुबह दस बजे का समय था नई ड्रेस नया bastaa और कुछ पुस्तकें लेकर मैं अपनी दादी के साथ स्कूल पहुँचा। उस समय स्कूल में प्रार्थना होने वाली थी, गुरूजी ने दादी से कहा प्रार्थना के बाद बात करेंगे । मैं अपनी दादी को एक चबूतरे पर बिठा कर ख़ुद उनके बगल में खड़ा हो गया ।
थोडी देर बाद प्रार्थना कि तैयारी शुरू हुई बच्चों को सावधान-विश्राम कराया गया। अचानक गुरूजी ने मुझे मंच पर आने का इशारा किया। मैं दादी के पास अपना बस्ता रखकर मंच पर गया ।
अब गुरूजी ने मुझसे कहा तुम प्रार्थना शुरू कराओ । मैंने प्रार्थना शुरू कराई और उस दिन के बाद मैंने एक दिन भी स्कूल से अनुपस्थित नहीं हुआ । अगर किसी दिन पाँच दस मिनट लेट भी हो जाता था तो सारे बच्चे लाइन में खड़े होकर मेरा इन्तेज़ार करते थे । मैं ही रोज़ प्रार्थना करवाता था ।
अब मुझे समझ में आता है कि हमारे पिता स्पेशल क्यों हैं । गुरूजी दादी को देखकर समझ गए थे कि मैं बिहारीजी का बेटा हूँ और उन्होंने उस ज़रा सी उम्र में ही एक मंच दे दिया।
अगले अंक में कुछ और नई बातें
तब तक के लिए विदा चाहूँगा ।
शुभ रात्रि
Subscribe to:
Comments (Atom)